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मनहरण घनाक्षरी छंद

गुरु पूर्णिमा    आखर बिखरे मेरे, भटकन में घनेरे, गुरु बिन राह कहाँ,सुपथ दिखाइये। तिमिर में डूबी हुई,विवेक लौ धीमी हुई, ज्योति सम आप गुरु,ये दीप्ति जलाइये। गुरु को प्रणाम करूँ,लेखनी में रस भरूँ सुर सजे कवित्त में,आशीष दे जाइये। जब से सान्निध्य पाया,लेखन निखर आया, गुरुकृपा बनी रहे, प्रणाम स्वीकारिये। मधु झुनझुनवाला ✍️ ०३.०७.२०२३

मनहरण घनाक्षरी छंद

 सरस्वती वंदना  (१) नमामि  हंसवाहिनी, हे मां  कमलवाहिनी, वंदन है   करबद्ध, स्तुति स्वीकार करो।१। अज्ञानतम   छाया है, पथभ्रमित   काया है ज्ञानपुंज  दिव्यज्योति मां अंधकार हरो ।२। शुचिता हो लेखन में , पावनता  जीवन  में , रसना  मधुर  बोले , नहीं अहंकार हो ।३। तिमिर अंतर  घिरा मिले नहीं कोई सिरा धुंध छाई  चहुं  ओर मधु उद्धार करो ।।४।। मधु झुनझुनवाला  करें हम अराधना मां कमलवाहिनी,🙏🙏