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मनहरण घनाक्षरी छंद

गुरु पूर्णिमा    आखर बिखरे मेरे, भटकन में घनेरे, गुरु बिन राह कहाँ,सुपथ दिखाइये। तिमिर में डूबी हुई,विवेक लौ धीमी हुई, ज्योति सम आप गुरु,ये दीप्ति जलाइये। गुरु को प्रणाम करूँ,लेखनी में रस भरूँ सुर सजे कवित्त में,आशीष दे जाइये। जब से सान्निध्य पाया,लेखन निखर आया, गुरुकृपा बनी रहे, प्रणाम स्वीकारिये। मधु झुनझुनवाला ✍️ ०३.०७.२०२३